1)
इतनी सी तमन्ना थी कि, छू लूं कभी आसमान को।
पर नींद खुली तो बाहर देखा, इस दुनिया मे हो रहे बुरे हाल को।
फिर सोचा मैने मन में कि, छोड़ दूँ इस माया-मोह के जाल को।
जब देखा घर, गांव, समाज मे लड़का-लड़की मे हो रहे भेदभाव को।
फिर हुआ सवेरा,आ पहुंचे हम आठ मार्च को।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के शुरू हो रहे जनजाल को।
धीरे-धीरे ये भी भूल गए लोग, आ गए अपनी औकात को।
फिर से शुरु होने लग गए समाज मे,लड़का -लड़की मे भेदभाव को।
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